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इंसानों में मिला नया ब्लड ग्रुप सिस्टम ‘जामा’, बना 49वां रक्त समूह

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  • दुर्लभ एंटीबॉडी के अध्ययन से सामने आई खोज.
  • सुरक्षित रक्त चढ़ाने में मिलेगी मदद.

नई दिल्ली। रक्त हमारे शरीर में ऑक्सीजन और पोषक तत्वों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। किसी मरीज को रक्त चढ़ाने से पहले उसके ब्लड ग्रुप की पहचान करना बेहद जरूरी होता है। आमतौर पर ए, बी, एबी और ओ ब्लड ग्रुप के साथ आरएच सिस्टम की जानकारी सबसे अधिक होती है। हालांकि, वैज्ञानिकों के अनुसार मानव रक्त की पहचान केवल इन सामान्य समूहों तक सीमित नहीं है। लाल रक्त कोशिकाओं की सतह पर मौजूद अलग-अलग एंटीजन और प्लाज्मा में मौजूद एंटीबॉडी रक्त समूहों की पहचान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

इसी क्रम में ब्रिटेन और इजराइल के वैज्ञानिकों ने इंसानों में एक नए ब्लड ग्रुप सिस्टम की पहचान की है। इसे ‘जामा’ (Jama) नाम दिया गया है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार इंटरनेशनल सोसाइटी ऑफ ब्लड ट्रांसफ्यूजन ने इसे मानव रक्त का 49वां ब्लड ग्रुप सिस्टम मान्यता दी है। इस रक्त समूह की पहचान एफ-11-आर (F11R) नामक जीन और उससे बनने वाले जामा प्रोटीन से जुड़ी है। इसी प्रोटीन के आधार पर इस नए ब्लड ग्रुप सिस्टम का नाम ‘जामा’ रखा गया है।

इजराइली महिला के रक्त से मिला सुराग

वैज्ञानिकों को इस नए ब्लड ग्रुप सिस्टम का पता एक इजराइली महिला और उसके भाई के रक्त में मौजूद एक दुर्लभ एंटीबॉडी के अध्ययन के दौरान चला। एंटीबॉडी शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली का हिस्सा होती है, जो बाहरी तत्वों को पहचानकर उनके खिलाफ प्रतिक्रिया करती है। शोध के दौरान वैज्ञानिकों ने एफ-11-आर जीन और उससे बनने वाले जेएएम-ए प्रोटीन से जुड़े आनुवंशिक बदलावों की पहचान की।

शोध से सामने आया कि ‘जामा’ ब्लड ग्रुप वाले लोगों में सामान्य लोगों की लाल रक्त कोशिकाओं पर पाया जाने वाला एक खास एंटीजन मौजूद नहीं होता। एंटीजन को कोशिकाओं की सतह पर मौजूद ऐसी पहचान के रूप में समझा जा सकता है, जिसे शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली पहचानती है। यही अंतर रक्त चढ़ाने के दौरान महत्वपूर्ण हो सकता है।

गलत रक्त चढ़ने पर हो सकती है गंभीर प्रतिक्रिया

दुर्लभ ब्लड ग्रुप वाले मरीजों के मामले में सही रक्त की पहचान बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है। यदि ऐसे व्यक्ति को उसकी रक्त संबंधी विशेषताओं से मेल नहीं खाने वाला सामान्य रक्त चढ़ा दिया जाए, तो शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली उसे अलग समझ सकती है। इसके बाद एंटीबॉडी चढ़ाई गई लाल रक्त कोशिकाओं पर हमला कर सकती हैं, जिससे गंभीर ट्रांसफ्यूजन रिएक्शन का खतरा पैदा हो सकता है।

डीएनए जांच से मरीज और रक्तदाता की पहचान में मदद

वैज्ञानिकों के अनुसार नए ब्लड ग्रुप सिस्टम की पहचान से दुर्लभ रक्त समूह वाले मरीजों और उनके लिए उपयुक्त रक्तदाताओं की पहचान करने में मदद मिल सकती है। डीएनए जांच के माध्यम से मरीज और संभावित रक्तदाताओं की रक्त संबंधी विशेषताओं की पहचान की जा सकेगी। इससे भविष्य में सुरक्षित रक्त चढ़ाने और दुर्लभ एंटीबॉडी से जुड़ी समस्याओं को बेहतर तरीके से संभालने में मदद मिलने की उम्मीद है।

केवल एबीओ और आरएच तक सीमित नहीं हैं ब्लड ग्रुप

आम लोगों के बीच एबीओ और आरएच ब्लड ग्रुप सिस्टम सबसे अधिक प्रचलित और चर्चित हैं, लेकिन मानव लाल रक्त कोशिकाओं की सतह पर कई अन्य प्रकार के एंटीजन मौजूद होते हैं। इन एंटीजन की संरचना में अंतर के आधार पर अलग-अलग ब्लड ग्रुप सिस्टम की पहचान होती है। ऐसे दुर्लभ रक्त समूहों की जानकारी रक्त चढ़ाने के दौरान विशेष रूप से महत्वपूर्ण हो सकती है।

पहले भी सामने आ चुके हैं नए ब्लड ग्रुप

मानव रक्त समूहों को लेकर वैज्ञानिकों की खोज लगातार जारी है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार सितंबर 2024 में एमएएल (MAL) ब्लड ग्रुप की खोज से जुड़ी जानकारी सामने आई थी। इसके बाद अगस्त 2025 में भारत और ब्रिटेन के वैज्ञानिकों की टीम ने सीआरआईबी (CRIB) ब्लड ग्रुप की पहचान की थी।

नए रक्त समूहों की पहचान से यह स्पष्ट होता है कि रक्त की संरचना और प्रतिरक्षा प्रणाली से जुड़े पहलुओं को समझने के लिए वैज्ञानिक अनुसंधान लगातार आगे बढ़ रहा है। विशेष रूप से दुर्लभ रक्त समूह वाले मरीजों के लिए ऐसी खोजें भविष्य में अधिक सुरक्षित और सटीक रक्त आधान व्यवस्था विकसित करने में उपयोगी साबित हो सकती हैं।